Monday, December 12, 2016

चिंतन

क्या लिखूँ?
लिख के करूँ क्या?
क्यूँ लिखूँ?
फिर लिख भी दूँ क्या?
रण को परिभाषित करूँ?
या करूँ विचरण हृदय की वर्जनाओं में?
वासना के मूल का वो गूढ़ प्रतिपादित करूँ?
रंजना, अतिरंजना या कल्पना?
किसके काँधे सर रखूं?
किस विषय का पत्र पर विलयन करूँ?
मै करूँ क्या?
अब लिखूँ?
तो क्या लिखूँ?

Saturday, December 10, 2016

पसंद

स्याह से भी स्याह होता जा रहा है अब चमन,
हो गए हैं क्यों सभी,
काले गुलाबों के दीवाने.
बिल बहुत हैं रास्तों पे,
देखना कुछ गौर से हर एक कदम को,
जाने कब, किस  खोह  में कोई साँप हो,
रुक के चलो.
न सूँघो बोतलें, अब लौट जाओ,
नही मिल पाएगी वो खुशबू,
जो उस मिट्टी में थी,
न कोसो आइनों को,
वो सच ही बोलते हैं,
तुमसे, मुझसे और सभी से ही हमेशा,
क्यूँ नकली बन गए हैं हम,
नक़ल करते हुए,
हम ही हम को नहीं पहचान पाते.

Friday, December 9, 2016

आवश्यकता

सोचा जरुरत की लिस्टें बना लूँ,
थोड़ा तो जीवन ये बेहतर बनेगा.
हर एक चीज मौके पे होती नहीं है.
और मौके पे ये बात खलती बड़ी है.
ये कुर्सी, खटोला जो टूटा हुआ है,
इन्हें भी मरम्मत को देना पड़ेगा.
ये अलमारी खाली, न खाली रहेगी,
इसमें अब अपनी मै, दुनिया भरूँगा.
सोचा कि थोड़ी तो सुविधा रहेगी,
चलो अपने घर को मै दिल भर बना लूँ.
उठा कर कलम जो लिस्टें शुरू कीं,
पन्ने सभी घर के कम हो चले थे,
वो स्याही जो बरसों से सूखी नहीं थी,
मिनटों में सारी खतम हो गई
मगर फिर भी बहुत सारी चीजें,
अभी लिक्खी जाने को बाकी बची थीं.
जरुरत की लिस्टें जरूरी बहुत थीं,
जरुरत मगर बदचलन हो चुकी थी.
फिर कुर्सी पे अपने टिकाया जो सर को,
समझ में समझ आई खुदगर्ज़ मर्जी,
जो सोते जमीनों पे,तारों के नीचे,
वो लिस्टों में मेरी भला क्यूँ समाते?
वो टूटा खटोला,
वो टूटी सी कुर्सी,
है मेरी मयस्सर,
वही पे खतम है वो मेरी जरुरत.
मै खुद में ही पूरा जमाना समेटे,
जरुरत की मुझको जरुरत नहीं है.

Tuesday, December 6, 2016

चुनौती

जो गुफाओं, कंदराओं में छिपे थे,
अंधे, अंधेरों के,
जो खुद में व्यस्त थे.
वो निकल बाहर,
उजालों को बहुत ललकारते हैं,
पर उजाला जानता है,
आँख पर पट्टी लपेटे, ये निगोड़े,
हैं यहाँ तफरीह को.
खलबली थोड़ी मच के और हल्ला गुड़गुडा के,
ये चले जायेंगे फिर से,
उस अँधेरे खोल में,
इनसे बेहतर तो
गुफाओं में बने सुराख हैं,
रौशनी का रास्ता
जो हैं कभी ना रोकते.
रौशनी क्यूँ कर करे,
अंधेरों से कोई मुकाबला,
ये सिमटते खोल में अपने अकेलेपन के साथ,
रौशनी को तो नहीं रुकना कहीं,
बिखर के साथ लेना है सभी को,
वो रौशनी है,

Monday, December 5, 2016

खाम खां

कभी मुझे इस वक़्त से बड़ी हमदर्दी  होतीहै.
हर वक़्त भागता रहता है.
लगता है कभी इसका हाथ पकड़ कर
रोक लूँ इसे
और अपने हिस्से का थोड़ा सकून दे दूं.
पर जब तक मै सोचता हूँ,
वो थोड़ा और आगे बढ़ चुका होता है.
एक बार उसकी पोटली मे छेद से झाँकने की कोशिश की
तो पता लगा ये तो बड़ा अमीर है.
पता नहीं कितने लोगों का
सकून लिए, आराम छीने और तसल्लियाँ बटोरे
भागा जा रहा है.
तो फिर मै भी भागा उसके साथ,
ये देखने कि ये चोर काम कैसे करता है?
पर मैंने पाया कि वक़्त ने कुछ भी नहीं चुराया.
उसने तो अदला-बदली की.
ऐशो-आराम, पैसे और शोहरत के बदले लोग
खुद उसे अपना सकून देते गए.
कुछ लोग तो अपनी जिंदगी के कुछ साल ही बेचते गए.
तो कुछ पूरी जिंदगी.
पर कुछ सौदे से मुकर गए.
वो गरीब
आज भी मस्त हैं.
अपनी चारपाई पर, अपने आँगन में.
और वक़्त,
जलता है उनसे.