Monday, December 5, 2016

खाम खां

कभी मुझे इस वक़्त से बड़ी हमदर्दी  होतीहै.
हर वक़्त भागता रहता है.
लगता है कभी इसका हाथ पकड़ कर
रोक लूँ इसे
और अपने हिस्से का थोड़ा सकून दे दूं.
पर जब तक मै सोचता हूँ,
वो थोड़ा और आगे बढ़ चुका होता है.
एक बार उसकी पोटली मे छेद से झाँकने की कोशिश की
तो पता लगा ये तो बड़ा अमीर है.
पता नहीं कितने लोगों का
सकून लिए, आराम छीने और तसल्लियाँ बटोरे
भागा जा रहा है.
तो फिर मै भी भागा उसके साथ,
ये देखने कि ये चोर काम कैसे करता है?
पर मैंने पाया कि वक़्त ने कुछ भी नहीं चुराया.
उसने तो अदला-बदली की.
ऐशो-आराम, पैसे और शोहरत के बदले लोग
खुद उसे अपना सकून देते गए.
कुछ लोग तो अपनी जिंदगी के कुछ साल ही बेचते गए.
तो कुछ पूरी जिंदगी.
पर कुछ सौदे से मुकर गए.
वो गरीब
आज भी मस्त हैं.
अपनी चारपाई पर, अपने आँगन में.
और वक़्त,
जलता है उनसे.

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