Saturday, December 10, 2016

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स्याह से भी स्याह होता जा रहा है अब चमन,
हो गए हैं क्यों सभी,
काले गुलाबों के दीवाने.
बिल बहुत हैं रास्तों पे,
देखना कुछ गौर से हर एक कदम को,
जाने कब, किस  खोह  में कोई साँप हो,
रुक के चलो.
न सूँघो बोतलें, अब लौट जाओ,
नही मिल पाएगी वो खुशबू,
जो उस मिट्टी में थी,
न कोसो आइनों को,
वो सच ही बोलते हैं,
तुमसे, मुझसे और सभी से ही हमेशा,
क्यूँ नकली बन गए हैं हम,
नक़ल करते हुए,
हम ही हम को नहीं पहचान पाते.

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