Tuesday, December 6, 2016

चुनौती

जो गुफाओं, कंदराओं में छिपे थे,
अंधे, अंधेरों के,
जो खुद में व्यस्त थे.
वो निकल बाहर,
उजालों को बहुत ललकारते हैं,
पर उजाला जानता है,
आँख पर पट्टी लपेटे, ये निगोड़े,
हैं यहाँ तफरीह को.
खलबली थोड़ी मच के और हल्ला गुड़गुडा के,
ये चले जायेंगे फिर से,
उस अँधेरे खोल में,
इनसे बेहतर तो
गुफाओं में बने सुराख हैं,
रौशनी का रास्ता
जो हैं कभी ना रोकते.
रौशनी क्यूँ कर करे,
अंधेरों से कोई मुकाबला,
ये सिमटते खोल में अपने अकेलेपन के साथ,
रौशनी को तो नहीं रुकना कहीं,
बिखर के साथ लेना है सभी को,
वो रौशनी है,

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