Friday, December 9, 2016

आवश्यकता

सोचा जरुरत की लिस्टें बना लूँ,
थोड़ा तो जीवन ये बेहतर बनेगा.
हर एक चीज मौके पे होती नहीं है.
और मौके पे ये बात खलती बड़ी है.
ये कुर्सी, खटोला जो टूटा हुआ है,
इन्हें भी मरम्मत को देना पड़ेगा.
ये अलमारी खाली, न खाली रहेगी,
इसमें अब अपनी मै, दुनिया भरूँगा.
सोचा कि थोड़ी तो सुविधा रहेगी,
चलो अपने घर को मै दिल भर बना लूँ.
उठा कर कलम जो लिस्टें शुरू कीं,
पन्ने सभी घर के कम हो चले थे,
वो स्याही जो बरसों से सूखी नहीं थी,
मिनटों में सारी खतम हो गई
मगर फिर भी बहुत सारी चीजें,
अभी लिक्खी जाने को बाकी बची थीं.
जरुरत की लिस्टें जरूरी बहुत थीं,
जरुरत मगर बदचलन हो चुकी थी.
फिर कुर्सी पे अपने टिकाया जो सर को,
समझ में समझ आई खुदगर्ज़ मर्जी,
जो सोते जमीनों पे,तारों के नीचे,
वो लिस्टों में मेरी भला क्यूँ समाते?
वो टूटा खटोला,
वो टूटी सी कुर्सी,
है मेरी मयस्सर,
वही पे खतम है वो मेरी जरुरत.
मै खुद में ही पूरा जमाना समेटे,
जरुरत की मुझको जरुरत नहीं है.

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